इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ एण्ड हाइजीन एनविस सेंटर, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार

Printed Date: 22 अप्रैल 2019

सुलभ प्रौद्योगिकी

डा. बिंदेश्वेर पाठक ने शौचालयों के विभिन्न डिजाइन और इस क्षेत्र में भारत और विदेशों में किए गए कार्यों का अध्ययन किया और सुलभ शौचालय प्रौद्योगिकी का विकास किया, जो तकनीकी दृष्टि  से उचित सामाजिक-सांस्कृतिक तौर पर स्वीकार्य और आर्थिक रूप से सस्ती् सस्ती है। यह कम लागत की है और इसके लिए फ्लश करने के लिए केवल दो लीटर पानी की आवश्यतकता है। और यह उन स्थानों के लिए भी उपयोगी है जहां पर्याप्तल पानी उपलब्ध नहीं है। इसके लिए सफाई कर्मियों की सेवा की आवश्येकता नहीं होती और न ही यह हवा को प्रदूषित करता है। यह शौचालय स्थल पर खाद भी प्रदान करता है। इसे साफ किया जा सकता है। घर के सदस्यों द्वारा आसानी से इसका रखरखाव किया जा सकता है। इसमें दो गड्ढ़े वैकल्पिक रूप से काम करते हैं। इसका उन्नयन किया जा सकता है अर्थात सीवर की सुविधा उपलब्ध होने पर इसे आसानी से सीवर के साथ जोड़ा जा सकता है। भारत सरकार, राज्य सरकारें विभिन्न राष्ट्री य, द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्री य एजेंसियां जैसे यूनिसेफ, डब्ल्यूएचओ, यूएनडीपी/विश्वि बैंक आदि ने स्वीकार किया है कि सुलभ शौचालय (दो गड्ढ़े/पिट फ्लश शौचालय) सबसे कम लागत वाला उपयुक्त तकनीकी विकल्प है। उन्होंने भारत और अन्य विकासशील देशों में इस प्रणाली को अपनाने का सुझाव दिया है। भारत सरकार ने लघु और मध्यम शहर के समन्वित विकास कार्यक्रम (आईडीएसएमटी) में एक घटक के रूप में कम लागत की स्वच्छता को शामिल किया है। शहरी आवास और विकास निगम (हुडको) ने भी लाभार्थियों की विभिन्न श्रेणियों को कम लागत की स्वच्छता के लिए वित्तीय सहायता देना शुरू कर दिया है।

 

स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रभाव


अध्ययनों से पता चलता है कि मानव के मलमूत्र से विभिन्न प्रत्ययक्ष और अप्रत्यक्ष माध्यमों से 50 से अधिक संक्रामक रोग एक रोगग्रस्त व्यक्ति से दूसरे स्वस्थ व्यक्ति में फैल सकते हैं या संचरित हो सकते हैं। भारत में होने वाली मौतों में बड़ी संख्या में मृत्यु अतिसारीय रोगों से होती है। मानव मल को सुरक्षित ढंग से निपटान करने से स्‍वास्य्यु  पर सकारात्म प्रभाव पड़ा है, जिसके फलस्वरूप जठरांत्रीय बीमारी की दर में बहुत अधिक कमी आई है। 950 मिलियन लोगों में से 700 मिलियन लोग या तो खुले में शौच करते हैं या अस्वास्थ्यकर बाल्टी या सूखे शौचालयों को इस्तेमाल करते हैं, जिससे पूरे समुदाय को स्वास्थ्य संबंधी खतरा उत्पन्न हो जाता है और वातावरण दूषित हो जाता है। भारत में बाल्टी और शुष्की शौचालयों की संख्या लगभग 7.64 लाख है, जिनमें से लगभग 5.4 लाख शहरी भारत में और शेष ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।

 

अनुसंधान और विकास(RESEARCH & DEVELOPMENT  )


सुलभ इंटरनेशनल नई टिकाऊ प्रौद्यागिकी, प्रदर्शन और प्रसार, कम लागत की स्वच्छता, कम लागत का अपशिष्टर जल उपचार, ठोस कचरा प्रबंधन, पर्यावरण और अध्ययन प्रदूषण आदि क्षेत्रों में प्रशिक्षण और परामर्श के विकास में लगा हुआ है।  इस संस्थान में बड़ी संख्या में योग्य वैज्ञानिक और इंजीनियर काम कर रहे हैं। नीचे इसके अनुसंधान और विकास के कुछ बेहतरीन उदाहरण दिए गए हैं, जिसने सुलभ इंटरनेशनल को स्वच्छता, साफ-सफाई और सीवर (मलजल) उपचार के क्षेत्र में न केवल भारत में बल्कि विश्वस भर में एक सम्मानित स्थाऔन दिया है।

 

डकवीड आधारित अपशिष्‍ट जल उपचार प्रणाली

 

डकवीड (लैमनासी) एक जलीय पौधा है, जो 15 डिग्री सेल्सियस से 30 डिग्री सेल्सियस की अनुकूल तापमान श्रृंखला में प्रचुर मात्रा में बड़ा हो सकता है और 2-4 दिन के भीतर अपने वजन को दोगुना कर सकता है। इसकी उपज प्रतिदिन 1 टन/हैक्टेयर के लगभग हो सकती है। चूंकि डकवीड को उगने के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस ओर पोटेशियम की आवश्ययकता होती है और मलजल में इन पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा होती है, इसलिए यह अपशिष्टा जल के उपचार के लिए बहुत प्रभावी तकनीक है। डकवीड तालाबों में अवायवीय प्रतिक्रियाएं और डकवीड दोनों की गतिविधियां कार्बनयुक्त पदार्थ, पोषक तत्व और ट्रेस धातुओं को हटाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। डकवीड में अपशिष्टा जल से बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड (बीओडी), रासायनिक आक्सीजन डिमांड (सीओडी), निलंबिल ठोसों, भारी धातुओं और यहां तक कि विशाक्त तत्वों और कुछ रोगजनक सूक्ष्मजीवों को कम करने की व्यापक क्षमता होती है। यह मछली के लिए एक पूर्ण आहार है और प्रोटीन तथा विटामिन ए और सी की उच्च मात्रा के कारण यह मुर्गी और पशुओं  के लिए एक बेहद पौष्टिनक आहार है। तालाबों में पारंपरिक आहार की तुलना में डकवीड आहार देने से मछलियों के उत्पादन में दो से तीन गुना वृद्धि होती है। सुलभ ने अखिल भारतीय स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्य् ेह संस्थान, कलकता के साथ सहयोग से प्रदर्शन-सह अध्ययन परियोजनाओं को अपने हाथ मे लिया है। दिल्ली और पश्चिुम बंगाल में हालीशहर में स्थित तीन शहरी परियोजनाओं को केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा वित्त प्रदान किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत अन्य दो को परियोजनाओं को ग्रामीण क्षेत्र और रोजगार मंत्रालय, भारत सरकार, रायल और डेनिश दूतावास द्वारा वित्त पोषित किया जा रहा है। इन्हें क्रमश: हरियाणा और उड़ीसा राज्यों में क्रियान्विित किया जा रहा है।

 

मानव मल से बायोगैस

 

अपने वर्तमान स्वरूप में सुलभ बायोगैस संयंत्र में एक प्रवेश कक्ष, एक अवायवीय पाचक (डाइजेस्‍टर) और एक निर्गम (आउटलेट) कक्ष होते हैं। पाचक बेलनाकार होता है,  इसका पेंदा और शीर्ष गुम्‍बददार होता है और यह जमीन के नीचे स्थापित होता है। शौचालय की सीट से मलमूत्र ढ़की हुई नालियों द्वारा प्रवेश कक्ष (इनलेट चेंबर) में और फिर पाचक में चला जाता है। पचा हुआ घोल निर्गम पाइप के माध्यम से पाचक से बाहर आता है, निर्गम कक्ष (आउटलेट चैम्ब र) में पहुंचता है और फिर ढ़की हुई नालियों से सोक पिट में चला जाता है। सफाई (कचरा साफ करने) और अन्य रखरखाव के कार्य करने के साथ-साथ (डाइजेस्टर) के प्रचालन के दौरान समस्याओं की जांच करने के लिए एक बड़ा वायुहीन गोल मेन होल डाजेस्टर के ऊपर बनाया जाता है।

बहि:स्राव के अंतिम निपटान के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी की जा सकती है, लेकिन यह स्थान की स्थितियों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, मल-जल से मल को हटाकर इसका प्रयोग बाग-बगीचों, फूल की क्यारियों और बगीचे की सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। साइट की स्थिति अनुकूल होने पर मल को सुखाने के लिए क्यारियां बनाई जा सकती हैं। बायोगैस पाचक के अंदर पाचक घोल के जलीय (हाइड्रोलिक) विस्थापन द्वारा स्थिर गुंबद के नीचे संग्रहीत किया जाता है। वैकल्पिक रूप से गैस को भी अलग से पानी पर तैरते हुए अलग ड्रम में संग्रहीत किया जा सकता है। बाद वाले मामले में, गैस के दबाव को नियंत्रित किया जाता है जो इसके उपयोग में सहायता प्रदान करता है। इसलिए, विशेष रूप से, बड़े संयंत्रों के लिए अतिरिक्त लागत के बावजूद अलग से एक गैस होल्डर का होना जरूरी है।

 

  1. इस डिजाइन के आधार पर सुलभ द्वारा अब तक देष के विभिन्न राज्यों में 102 बायोगैस संयंत्र बनाए गए हैं। प्रतिदिन इनसे 30 से 60 घन मीटर बायो गैस का उत्पादन किया जाता है।
  2. बायोगैस का उपयोग खाना पकाने, मैंटल लैंप, बिजली उत्पादन, सर्दियों के दौरान शरीर को गर्म करने के लिए किया जाता है।
  3. प्रति दिन लगभग 2000 व्यक्तियों द्वारा सार्वजनिक सुविधा का उपयोग करने से लगभग 60 घनमीटर बायो गैस का उत्पादन किया जा सकता है, जिससे एक दिन में एक 10 केवीए के एक जेनसेट को 8 घंटे तक चलाया जा सकता है और इससे 65 इकाई बिजली का निर्माण कर सकते हैं। बायो गैस से निर्मित बिजली की आपूर्ति सुबह से शाम तक प्रसिद्ध गांधी मैदान, पटना (बिहार, भारत में एक राज्य) के आसपास और बस स्टैंड रांची (बिहार) मे के  लिए की जा हरी है।

     

सेट (सुलभ बहि:स्रावी प्रौद्योगिकी) प्रौद्योगिकी

 

बायोगैस संयंत्र के बहिःस्रावी की एक अच्छी तरल खाद होती है क्योंकि इसमें पौधों के लिए आवश्यैक कई सू्क्ष्मब पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रेंट्स) के अलावा नाइट्रोजन पोटाश और फास्फोएरस पर्याप्त‍ मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन इसमें बिषाणुयुक्त (बैक्टीरियल) रोगजनकों, दुर्गंध और इसका असुंदर रंग खाद के रूप में इसका उपयोग करने में बाधक हैं। चूंकि सुलभ देश भर में 5500 से अधिक सार्वजनिक शौचालयों का संचालन/रखरखाव कर रहा है, इसलिए उसके सामने संयंत्र के पोषक तत्वों की प्रतिशत संरचना को प्रभावित किए बिना इस तरह के बहि:स्राव को रोगजनकों, गंध और रंग से मुक्त करने की एक प्रमुख चुनौती थी।

प्रयोगों की एक श्रृंखला के बाद सुलभ इंटरेनशनल ने बहिःस्रावी मल के उपचार के लिए एक नई तकनीक विकसित की है। इस प्रौद्योगिकी को सेट (सुलभ बहि:स्राव मल उपचार) नाम दिया गया है, जो सक्रिय चारकोल के पश्चा त बहि:स्राव मल की निस्यंदन (फिल्ट्रे शन) प्रौद्योगिकी पर आधारित है। यह बहिःस्राव मल बीओडी (जैव-रासायनिक आक्सीजन की मांग) को >20 मि.ग्रा./1 से >10 मि.ग्रा./1 तक जलीय-कृषि और कृषि उपयोग अथवा किसी भी प्रकार के जल स्रोत में बहाने के लिए उपयुक्त होता है। अपशिष्टऔ जल के उपचार की विकेन्द्रीकृत प्रणाली कम लागत वाली है और अपशिष्टं गुणात्मक उपचार के लिए स्थानीय सरकारों के वित्तीकय बोझ को काफी हद तक कम कर सकती है।

 

सूखे जल - हायासिन्थ से बायोगैस और अन्य मिश्रित आहार

 

जल हायासिन्थ एक जलीय, मौसमी और राष्ट्रभ के लिए एक चिंताजनक घास है। भारत सरकार ने इससे छुटकारा पाने के लिए एक कार्य दल का गठन किया है। हालांकि इसका एक लाभ भी है। यह बायोगैस बनाने के लिए एक अच्छी सामग्री है। चूंकि यह खरपतवार मौसमी है, इसलिए इस पर आधारित बायोगैस संयंत्र इस घास की अनुपलब्धता की वजह से गर्मियों के दौरान गैर-कार्यात्मक हो जाते हैं। इस संगठन ने सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया है कि कटाई करने, सुखाने और इसका चूरा बनाने के बाद साल भर इस घास से बायोगैस का उत्पादन किया जा सकता है। इस खरपतवार के चूरे को आसानी से इधर-उधर ले जाया सकता है और साल भर बायोगैस बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। संस्थान ने अपशिष्टद के साथ मिश्रण कर और मिश्रण किए बिना सब्जियों/फलों के कचरे और घर के कीचन की अपशिष्टा सामग्री से बायोगैस का निर्माण करने के लिए अनेक प्रयोग किए हैं। मानव अपशिष्टा और सब्जी के अपशिष्टा को मिलाकर बेहतर परिणाम प्राप्त हुए हैं। इसने एक योगात्मक प्रभाव दिखाया है।

 

स्थल पर स्वच्छता और प्रौद्योगिकी का अधिकतम प्रयोग

 

सुलभ अंतरराष्ट्रीेय तकनीकी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान कम लगात वाली प्रौद्योगिकी के अनुकूलन में लगा हुआ है जिससे इसे और अधिक लागत प्रभावी और कुशल बनाया जा सके। स्थल (साइट) पर कम लागत की स्वजच्छहता से होने वाले मृदा प्रदूषण का भी अध्ययन किया जा रहा है। इस तरह का एक अध्ययन रेडियो आइसोटोप टेªसर से कलकत्ता के पास अखिल भारतीय स्वच्छता एवं जल स्वास्थ्य संस्थान कोलकाता और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, बंबई के साथ सहयोग किया गया।

संस्थान ने गड्ढे़ के आसपास मिट्टी में प्रवास के साथ-साथ मानव अपशिष्टे की धारण (रखे रहने की) धारण अवधि के संबंध में गड्ढ़ों में अलग-अलग रोगजनकों के जीवित रहने की प्रतिशतता का भी अध्ययन किया है। अध्ययनों से पता चला है कि गड्ढे़ से पच (डाइजेस्ट) कीचड़ को दो साल के बाद बाहर निकालने पर रोगजनकों का पूर्ण रूप से अभाव देखा गया है। कभी-कभी कृमियों के सिस्ट दो साल के बाद भी मौजूद रह जाते हैं। जब इस कीचड़ को 2-3 सप्ताह के लिए धूप में सुखाया जाता है तो यह सभी रोगजनक्रों से मुक्त हो जाता है। सूखी और दानेदार खुरदरी खाद गंधहीन और रोगजनकों से पूरी तरह मुक्त होती है

 

मानव मल से खाद

 

संस्थान ने सूखे पिंडों से छोटे-छोटे आकार की वर्गीकृत खुरदरी/दानेदार प्रसंस्कृत चाय पत्तियों की तरह लगने वाली खाद बनाने के लिए एक तकनीक विकसित की है। इसे खुरदरा बनाने, छोटे-छोटे टुकड़ों में तोडने के लिए एक बाल-मिल में संसाधित किया जाता है। तत्पश्चाबत इसे एक बडे़  मिक्सर में डाला जाता है, जहां पर खाद की नमी की मात्रा को पानी मिलाकर नियंत्रित किया  जाता है। इस तरह की खाद में पादप पोषक तत्वों का अच्छा प्रतिशत पाया जाता है। इसके अलावा यह मिट्टी, खाद और जल को धारण करने की क्षमता को भी बढ़ाता है। संस्थान ने विभिन्न सब्जियों और फूल पौधों पर इस खाद के प्रभाव के आकलन का अध्ययन किया है। सभी परीक्षण के मामलों में पौधों की वृद्धि पर खाद का बहुत ही उत्साहवर्धक प्रभाव दिखाई दिया है।

 

जल संवर्धन कला (हाइड्रोपोनिक्स) के रूप में बहिःस्राव डाइजेस्टर (पाचक) का उपयोग

 

बायागैस डाइजेस्टर पाचक में अच्छे पादप पोशक तत्व पाए जाते हैं। इसका प्रयोग सीधे घास के लान, फूल की क्यारियों अथवा कृषि प्रयोजनों के लिए भी किया जा सकता है। संस्थान ने सफलतापूर्वक जल संवर्धन कला (हाइड्रोपोनिक्स) यानी पौधों के मृदाहीन संवर्धन के रूप में इसके उपयोग का प्रदर्शन किया है। सबसे पहले बहि:स्राव मल को मिट्टी के बर्तन में धूप में रखकर सुखाया जाता है, जहां पर वाष्पीककरण द्वारा बहिःस्राव मल की सांद्रता बढ़ जाती है। इसे एक पतले प्लास्टिक के जाल से फिल्टरर किया जाता है। फिल्टर प्रवाह में कुछ ट्रेस तत्वों को मिलाया जाता है। इस तरह का बहिःस्राव तरल पूरी तरह से गंधहीन होता है। नल के पानी के साथ मिश्रित करने (मात्रा से 5 से 10 प्रतिशत) पर विशेष रूप से इस प्रकार के बहिःस्रावी मलजल में विभिन्न प्रकार के पौधे लगाए गए। पौधों को कांच की बोतल या किसी भी अन्य जार में कमरे के अंदर या बाहर रखा/उगाया जा सकता है। इस तरह की तकनीक दुर्लभ कैक्टस प्रजाति और अन्य सजावटी पौधों के संवर्धन के लिए उपयोगी है।

 

कृमि खाद (वर्मी-कम्पोस्टिंग)

 

कृमि खाद में घरेलू अपशिष्टत जल के उपचार के लिए केंचुओं का इस्तेकमाल किया जाता है। केंचुए को प्राकृतिक जैव-रिएक्टइर कहा गया है। केंचुआ सक्ष्मजीवों और एंजाइमों दोनों का उत्पादन करता है जो मिश्रित जैव अणुओं को सरल योगिकों में विधटित करता है, जिनका उपयोग अन्य सूक्ष्मजीवों द्वारा किया जाता है। केंचुए अपशिष्टन खाते हैं और इन्हें 2-4 माइक्रोन आकार के छोटे कणों में पीसतें हैं (माइक्रोन जिसे केंचुए के अंदर रहने वाले सूक्ष्म जीवों द्वारा उपयोग किया जा सकता है)।  इसमें अवायवीय (एरोबिक) स्थिति को बनाए रखा जाता है, इसलिए कोई बाहरी आक्सीजन की आवश्यसकता नहीं होती है। केंचुए स्थिर सूक्ष्म-पादपों और पोषक तत्वों के साथ वर्मी कास्टिंीग का उत्पाीदन करते हैं, जिसका प्रयोग जैव उर्वरक के रूप में किया जा सकता है। कृमि खाद सब्जीन के कचरे की खाद बनाने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। यह विधि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अधिक उपयुक्त है। इस संस्थान ने सफलतापूर्वक इस तकनीक का प्रदर्शन किया है। कृमि-खाद मे अपेक्षाकृत नाइट्रोजन की मात्रा अधिक होती है। संस्थान कृमि की वृद्धि दर को बढ़ाने में लगने वाले समय को कम से कम करने का प्रयास कर रहा है।